कबीरा खड़ा बज़ार में मांगे सबकी खैर ,
ना काहु से दोस्ती ना काहू से बैर
बहुत ही आसान है यह दोहा, जिसे कबीर साहब ने बहुत ही स्वच्छ हृदय से लिखा और मेरे जैसे सीधे-सादे लोगों ने दिल से गाया |
मेरे मित्र ,प्रसिद्द कवि ओम प्रकाश ओमी जी ने एक बार मुझसे कहा-सेवक जी ,आपका आदर्श तो कबीर दास जी का यह दोहा लगता है कि-ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
यह सुनकर मुझे एक सवाल ने घेर लिया कि क्या वाकई मेरी किसी से दोस्ती नहीं है या क्या वाकई मेरा किसी से बैर नहीं है ?
मैंने आत्ममंथन किया तो पाया कि मैं दुनिया से उदासीन तो नहीं हूँ और न ही वीतराग .कोई सन्यासी हूँ इसलिए कुछ लोगों से दोस्ती भी है और कुछ से वैर भी है |
वैर करने की बिलकुल इच्छा नहीं होती क्यूंकि कौन किस गहराई से वैर कर सकता है नहीं जानता |जिसे मामूली आदमी मानते हैं अगर उसके दिल में भी बैर का काँटा चुभ गया तो कितना भी खतरनाक हो सकता है इसीलिए बैर तो किसी से भी नहीं होना चाहिए लेकिन दोस्त कहते हैं कि आप लोगों को डोज (नसीहत )बहुत देते हो |
अधिकांश लोग डोज को पसंद नहीं करते |
जब हम बच्चे थे तो हर बुजुर्ग हमें डोज देता ही रहता था और हमारी गाड़ी पटरी पर ज्यों की त्यों दौड़ती रहती थी |बुजुर्ग अपना काम करते रहते थे और हम अपना |
इसके बावजूद हमें वो नसीहतें बिलकुल पसंद नहीं आती थी |हमें इंतजार रहती थी कि जब हम नसीहतें देने योग्य बनेंगे |
कहने का भाव इतना सा है कि नसीहतें किसी को पसंद नहीं आतीं फिर भी नसीहतें देनी पड़ती हैं बल्कि एक विद्वान ने तो इतना तक कहा है कि जिसे नसीहतें सुनने की आदत नहीं ,उसे फिर मलामत सुनने की आदत डाल लेनी चाहिए |इस तरह की बात मैं खुलकर कह देता हूँ तो भीतर एक प्रकार का भय भी पैदा हो जाता है कि नसीहत देना ही क्यों ?
मेरे साहित्यिक गुरु आदरणीय निर्मल जोशी जी मुझे और मेरे साथियों को बहुत नसीहतें देते थे |इन नसीहतों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता था और ज्यादातर लोग उनके प्रति शुक्रगुज़ार रहते थे |मुझे उनकी नसीहतें आज तक याद आती रहती हैं |उनकी नसीहतों के माध्यम से मिले उनके अनुभवों से लिखने का बहुत मैटर मिलता है आज भी |जोशी जी का जो स्टाइल था उसका असर मेरे व्यक्तित्व पर बहुत ज्यादा है |दोस्त कहते हैं कि आप भी जोशी जी की तरह बहुत सख्त बातें खुलकर कह देते हो |ऐसी बातें सुनकर मैं भयभीत भी हो जाता हूँ | क्यूंकि जोशी जी जब शरीर में थे तब भी कुछ लोग उन्हें दुर्वासा कहे थे जबकि वे दुर्वासा तो बिलकुल नहीं थे क्यूंकि वे कभी भी किसी का दिल दुखाना नहीं चाहते थे बल्कि यथार्थवादी थे |सच अगर कड़वा है तो वे कभी -कभी उस सच को भी बोल देते थे |
इस पगडण्डी पर खड़ा होकर मुझे लगता है कि इस अस्थायी दुनिया में जब मेरा ही कोई पक्का पता व ठिकाना नहीं है तो दोस्ती किस्से और क्यों ?
लेकिन जिन्हें मैं नसीहतें बांटता रहता हूँ ,उनके भीतर मेरे प्रति कितना वैर छिपा है ,कौन जान सकता है |इसलिए कबीर दास जी की भावना को ही अपनाना श्रेष्ठ है |इस दृष्टि से यथासंभव खामोश रहता हूँ |
सके बावजूद कही गयी बातें किसे कितनी नकारात्मकता से भरेंगी निश्चय से नहीं कह सकता |हाँ मेरे हृदय का भाव किसी के भी प्रति द्वेषपूर्ण नहीं रहता |
एक आध्यात्मिक व्यक्ति होने के नाते यह बात जरूर ध्यान रहनी चाहिए कि मुझे अपनी नीयत पर एक अघोषित पहरा तो जरूर रखना चाहिए |धन निरंकार जी
- रामकुमार 'सेवक'