गुरु में अप्रिय सच को भी स्वीकार करने का साहस होता है



 रामकुमार सेवक 

कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन का रथ हाँक रहे थे |सामने कर्ण था और वह दुर्योधन का मित्र था |श्री कृष्ण धर्म के पक्षधर थे और कर्ण चूंकि दुर्योधन का मित्र था और श्रीकृष्ण का विपक्षी था लेकिन कर्ण की स्वयं की कुछ विशेषताएं थीं ,जिनके कारण श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रशंसक थे और श्रीकृष्ण अर्जुन के मित्र थे और अर्जुन के सारथि वही थे |

अजीब सा सिलसिला था |कर्ण अधर्म के पक्ष में था लेकिन श्री कृष्ण धर्म के पक्षधर थे जबकि वे कर्ण का अंत नहीं चाहते थे |

कर्ण वीर था |वह अर्जुन का प्रतिद्वंद्वी था |अर्जुन कर्ण का प्रतिदवंद्वी था फिर भी वे कर्ण के धुर विरोधी नहीं थे बल्कि उसकी वीरता के प्रशंसक थे |

दोनों के रथ आमने सामने थे |वीर तो दोनों थे ही लेकिन कर्ण उपेक्षित था चूंकि राज परिवार उसे महत्त्व नहीं देता था |एक मात्र दुर्योधन था जो उसकी प्रतिभा को पहचानता था |अर्जुन की टक्कर का कोई वीर कौरवों की सेना में नहीं था इसलिए कर्ण से दोस्ती दुर्योधन के लिए अति आवश्यक थी |दुर्योधन धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था और युवराज भी था ,जिसके कारण उसका रुतबा बहुत था |दुर्योधन ने कर्ण के अपमान का समुचित लाभ उठाया |द्रोपदी के स्वयंवर में जबकि पूरा राजपरिवार कर्ण का अपमान कर रहा था |द्रोपदी ने भी कर्ण का अपमान किया और उसे अपने स्वयंवर में शामिल होने की अनुमति नहीं दी |दुर्योधन ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया और कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया |इससे कर्ण जैसा महाबली उसका मित्र बन गया और अर्जुन भी अब कौरवों के लिए अजेय नहीं रहा |

कर्ण और अर्जुन चूंकि समान प्रतिभा संपन्न थे इसलिए प्रतिभा की कोई कमी नहीं रही |

अर्जुन के सामने कर्ण तैनात था इस प्रकार आज युद्ध में महारथियों की  विशेष रूचि उत्पन्न हो गयी थी |श्रीकृष्ण स्वयं धर्म रत्न तो थे ही शूरवीर भी थे |

युद्ध के हर पक्ष को वे भली भाँति समझते थे |युद्ध में स्वयं को निरपेक्ष प्रकट करने की कोशिश करते थे |तथ्य तो यह है कि वे युद्ध के अनजाने पक्षों को भी जानते थे और किसी भी पक्ष को उपेक्षित नहीं छोड़ते थे |

कर्ण और अर्जुन में युद्ध चल रहा था |दोनों एक दूसरे के प्रतिदवंद्वी और समान प्रतिभा के धनुर्धर |थेअर्जुन ने देखा कि जब वह कर्ण पर शक्तियों का प्रयोग करता तो कर्ण का रथ काफी पीछे सरक जाता था जब कि कर्ण की शक्तियों का अर्जुन के रथ पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था |उसका रथ थोड़ा सा ही सरकता था |इस प्रकार की स्थिति देखकर अर्जुन को विशेष ख़ुशी होती था जबकि अर्जुन के हमले से कर्ण का रथ काफी पीछे हटता था लेकिन अर्जुन देख रहा था कि श्री कृष्ण कर्ण को बहुत प्रोत्साहन दे रहे हैं जबकि उसकी प्रयोग की गयीं शक्तियों का अर्जुन के रथ पर विशेष प्रभाव पड़ता ही नहीं जबकि कर्ण का रथ पीछे की और घिसटता चला जाता था |

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से इस व्यवहार का अंतर पूछा |यद्यपि हर एक महारथी जानता था कि किसी भी महारथी के आगे श्रीकृष्ण अर्जुन का ही पक्ष लेंगे लेकिन आज वे कर्ण का पक्ष लेते दिखाई दे रहे थे |

अंततः अर्जुन अपने असंतोष को दबा नहीं सका और उसने कहा-प्रभु कर्ण मेरे रथ को थोड़ा सा ही सरका पाता है जबकि मेरे हमलों को कर्ण ज्यादा झेल नहीं पाता तब भी कर्ण को ज्यादा प्रोत्साहित करते हैं ,इसका क्या कारण है |

श्री कृष्ण ने कहा -तुम्हारे रथ पर मैं स्वयं विराजमान हूँ इसके बावजूद कर्ण ज्यादा पीछे नहीं जाता जबकि कर्ण के वार को तुम उतना झेल नहीं पाते |अगर कर्ण को मेरा साथ मिला होता तो तुम उसका मकाबला कर नहीं पाते |सच्चाई यह है कि कर्ण की क्षमता तुमसे ज्यादा है |